चेतना के रंग
Tuesday, August 10, 2010
कुछ नया नहीं
सूरज ढलता
जाता दिन
थके कदम
परछाईया
रोज़ की बात है
कभी-कभी लगता है
अब कुछ नया नहीं
फिर भी
कंकरीट की सड़को
से अलग
गाँव के कच्चे रास्ते पर
धड़कते हैं
बच्चो के पांव,
खिलती ख़ुशी
मुस्कराता चेहरा,
सुकून देता है .
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