Monday, December 13, 2010

इन्तिज़ार-ए-प्रेम रहेगा


प्रियतमा,
यहाँ से
शुरू हो रही है
यात्रा
पतझड़ से सर्दी की,
...प्रेम से बेचैनी की

खुशबुएँ प्रेम की
इन्तहा हो गयी है, ,
मेरे बाल लम्बे,
गाल निष्प्रभ
चाल मन्द
हो गयी है

बैठा हु तुम्हारे
इंतज़ार में

इन्तिज़ार-ए-धूप रहेगा .
इन्तिज़ार-ए-इश्क रहेगा,
इन्तिज़ार-ए-प्रेम रहेगा.

पर उनको प्रेम नहीं छु पाता


कुछ लोग छु लेते है ,
निर्दोष निस्वार्थ प्रेम को

पर उनको प्रेम नहीं छु पाता

...कुछ लोग सवाल नहीं करते,
लिपट कर रो लेते है
हंस लेते है
खुश रहते है
प्रेममयी होते है

पर उनको प्रेम नहीं छु पाता

कुछ लोग
कभी तोड़ देते अपनापन
कभी भर देते है कहकहे
कभी सरकते है पकड़ से दूर
कभी तडपते है नजदीकी को

पर उनको प्रेम नहीं छु पाता

कुछ लोग
भरते है , हँसी -ठिठोली से रिश्ते
कलकल-से..चंचल-से रिश्ते
आँखों से चुपचुप पागल -से रिश्ते

पर प्रेम नहीं छु पाता उनको .

बसंत की तरह


बसंत की तरह
सुगंधित
फूल की तरह
महक
पंछी की तरह
...उन्मुक्त
बादल की तरह
बिखर
....गया हु
....प्रेम..प्यार में :)

साँसों में छोड़ गया


साँसों में छोड़ गया
ख़ुशबू ....
आँखों में
खुशी....
चेहरे पर
...जादू सुनहरा...
......तेरा प्यार :)

विध्या


निशिचंत, कामुक
धूप में बैठी विध्या बालन,
सपने बुन रही है :)
साडी में सुन्दरता के
नये आयाम बुन रही है .
...
पता नहीं कितने
शायर, कवी , लेखक
कम पड़ेंगे.
ऐसी देसी सुन्दरता
को प्रेषित करने में .
अभिव्यक्त करने में.

जब में


जब में फ़ोन करता हु
तो तुम फ़ोन के नजदीक नहीं होती
और जब तुम करती हो
में नहीं .
...........
...काश हम लोग भी
रजनीकांत की
तरह
मिस कॉल अटेएंड कर पाते. :)

नज़्म उलझी हुई है


नज़्म उलझी हुई है सीने में
दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा
...
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं ....
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
यदि दृष्टि प्राप्‍त हो जाती मेरे विवेक को
तो थोडा लैब में काम हो जाता. :)

पतझड के


पतझड के
सुनहरे
पत्तों के ऊपर
अंधेरे में
चांद सरकता है
...पक्षी करते हैं आवाज़

ऐसे परिवर्तित मौसम में,
किसी को पसंद है सोना ,
किसी को जागना,
और किसी को बेचैन रहना..

ख़याल उसका


ख़याल उसका
हर एक लम्हा
मन में रहता है

बदलते युग में


बदलते युग में
बदलती परिस्थियों में
नए विचारो ने आगमन किया है.

प्रोफेट खलील ने एक नया
...मार्ग प्रशस्त किया है

प्रेम से सगाई तक का सफ़र
सेटेलाइट के द्वारा ही तय किया है.

भाभीजी कोरीया में, खुद जर्मनी में ,
रिश्ता भारत में ही तय किया है.

दिल वो दरवेश है, जब जब आँख खोली ,
समय और दूरी, को भेद दिया है.

जर्मनी और भारत में दूरी कहाँ है!


जर्मनी और भारत में
दूरी कहाँ है!
मैं यहाँ रहूँ, वहाँ रहूँ, क्या फ़र्क पड़ता है?
फ़र्क पड़ता है कर्म का
स्वभाव का , मेलमिलाप का, अपेक्षा का
...रिश्तों का, संवाद का
मिठास का , जज्बात का

आदमी को प्रेम की, आनंद की , ..
उत्सव की तलाश होनी चाहिए
ईश्वर तो मिल ही जायेंगे :)

फिरू


प्रेमी ढूंढे में फिरू,
प्रेमी मिले न कोय :)

याद आती है


याद आती है
जब हम बच्चे थे,
समुद्र किनारे सीपियां बीनते
या रेत के किले बनाते
जरा भी परवाह किए बिना
...कि अगले ही पल पानी की लहर आए
और उन्हें नष्ट कर दे।

उत्सव मना रही है जिंदगी


ईश्वर ने दुनिया बनाई है
जो बड़ी खेलपूर्ण है, हंसी से भरपूर
प्रकाश के उजलेपन में
उत्सव मना रही है जिंदगी

जिस क्षण


जिस क्षण हम जीवन को
गैर-गंभीर होकर देखने लगते हो
हृदय के सारे बोझ विदा हो जाते हैं
मृत्यु के, जीवन के, प्रेम के
सभी भय विदा हो जाते हैं
...सब कुछ खो जाता है।
बहुत हल्का-फुल्का
भारविहीन हो जाते है
कि हम खुले आकाश में उड़ सकते है
उत्सव मनाते है
हंसी से भरपूर, खेलपूर्ण

देखता रहूँ


मध्यरात्रि में
प्यारी और भोले और निश्छल
भाव से
सोई हुई है
गहरी नींद में
...कितनी शान्त
एक मिठास लिए
होंठों पर एक मौन स्मिति
खिली हुई है
मेरा मन होता है
रात भर जागकर
उसे इसी मुद्रा में
देखता रहूँ

रोक लेता था..


मैं बहुत दिनों से.. बहुत दिनों से
बहुत-बहुत सी बातें
तुमसे चाह रहा था कहना

पहले रोक लेता था..
...
तुम्हारी खिड़की का उजाला

और आजकल अँधेरा . :)

आदतन

आदतन तुम ने कर दिये वादे
....
आदतन हम ने ऐतबार किया :)

आती है करीब


उसकी डबडबाई आँखों में
खिलते हैं कामना के फूल

वह आती है करीब
स्मृति के रंध्र-रंध्र में
रचती गंध का आकार

लाती है साथ,
एक आत्मीय अँधेरा

समय
इस पृथ्वी पर लिखता है
एक काली लड़की का नाम।

Khoya hu ...


Khoya hu uske khayalo me
Khoya hu suraj ki kirno me
Khoya hu fulo ki sugand me
Khoya hu mand mithi hawa me
Khoya hu .........khone me...

सपने और हकीकत


सपने और हकीकत
ही जीवन है.
फिर जो लोग सपने में
हमारे लिए
कुछ करते है
...उनको भी
धन्यवाद करना
हमारा कर्त्तव्य है