Monday, March 28, 2016

आशा बन सके

चाहे लेफ्ट हो,
चाहे राइट हो,
चाहे बीच में हो,
चाहे देश भक्त हो,
चाहे देश-विरोधी हो, 
चाहे अभिनेता हो,
चाहे नेता हो,
चाहे पुलिस हो,
चाहे चोर हो,
चाहे अध्यापक हो,
चाहे प्रोफेसर हो,
चाहे युवा हो,
चाहे पत्रकार हो,
चाहे एंकर हो,
चाहे छात्र हो, 
जब जब टीवी खोलता हु,
तो पाता हुँ,
की
सब गुस्से में है.
सब बेचैन है, 
सबकी चेतना
धुंधला गयी है,
विकृत हो गयी है, 
शायद,
इंसान को
धरती पर
आजादी नहीं,
उन्मुक्तता चाहिए। 
जिस से प्रेम उगने की
सम्भावना बन सके,
..
अँधेरे में थोड़े प्रकाश
की आशा बन सके.

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