Thursday, November 21, 2013

उद्विकास

अगर डार्विन अंकल कि मानें तो,
हर पल हम उद्विकास कि तरफ,
जा रहे है,
हमारा हर पल संजीदगी से,
उद्विकास में लगा है .

सहमत हु उनसे,
शायद अस्थि-पंजर कि चित्रकारी करके,
कुछ उद्विकास की कहानी पकायी जा सकती है,

कोसिस में हु, कई सालो से,
कि इंसान के व्यवहार कि,
चित्रकारी करू,
कुछ बताऊ कि,
हम विकास कि निशानी है,

भुत और वर्त्तमान में इंसान कि हरकतो
कि चीखो के बीच ,
मेरी ब्रश,
मौन है


- Nov. 10, 13

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