चेतना के रंग
Thursday, November 21, 2013
जैसे छुआ इश्क
जैसे छुआ इश्क
को,
तो आती थी,
रचनाओ की आवाज,
बनती थी कविताये,
बिन बुने,
गज़ले इनायत हो जाती थी.
मौसम की परवाह किये बगेर,
शायरी दिल को थाम लेती थी,
जब इश्क जिया,
तो,
आशिक खुद इश्क बन गया,
मेरा न लिखना
इश्क की इन्तहा है,
-November 29, 2012
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