चेतना के रंग
Friday, July 23, 2010
पिघलती कविता
नीली आँखें...
भरा पूरा...
गदराया जिस्म...
उफ़नता यौवन....
अछूता रूप...
शीतल तरुणाई...
इन सब से मिला कर...
बनी हो तुम...
ऐ मेरी पिघलती कविता..
March 30 at 7:47am
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