चेतना के रंग
Friday, July 23, 2010
उदास नेकार
आज नेकार नदी
बिलकुल उदास थी। ....
सोई थी अपने पानी में ....
उसके दर्पण पर-
बादल का वस्त्र पडा था। ...
मैंने उसको नहीं जगाया, ....
दबे पांव घर वापस आया।
March 31 at 3:22am
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