Friday, July 23, 2010

बिखरा

चरित्रहीन मौसम .....
नंगी शाखाओं से उन्मन....
निर्लज दोपहरी.....
मधु-स्तन...
चेहरा गोल...
आँखें सीपियाँ....
नावनुमा भौंहें...
होंठ लिपस्टिक बिन लाल ....
चंचल-अंचल....
यौवनमयि...
मन तो सतरंगी...
भटका, ताना बाना....
उजला कभी...
उच्छल बन....
बिखरा....
.............
उस पर निशान
उंगलियों के मर्दाना।


June 11 at 1:48pm

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