क़लम तोड़ते बचपन बीता,
पाती लिखते गई जवानी,
लेकिन पूरी हुई न अब तक,
दो आखर की प्रेम-कहानी,
और न बिसराओ-तरसाओ,
जो भी हो उत्तर भिजवाओ ,,
जपते उनका नाम यहाँ हम ...
यौवन में बनकर संन्यासी....
सावन बिना मल्हार बीतता,
फागुन बिना फाग कट जाता, :)
November 24, 2009 at 3:04am
No comments:
Post a Comment