मत रूठो मुझसे
मेरे स्वामी!
देखो, मैं बन सकती हूँ
तुम्हारी माँ,
मित्र तो हूँ ही मैं,
तुम मानो या नहीं।
वक्त पड़े अगर तो
मैं बन जाउंगी
तुम्हारी दासी भी,
पर मत कहो मुझसे
बनने के लिए
वेश्या तुम्हारी!
कि छटपटाती है
मेरी आत्मा
अदा करने मैं तुम्हे
ये कीमत
तुम्हारे दिए इस
रोटी, कपड़े और मकान की ।
हो सके तो
बना लो मुझे अपनी प्रेमिका,
करो मुझसे प्यार,
और मैं दे दूंगी
वो सब कुछ तुम्हे
जो भी है मेरे पास।
एक बात पूछूं मैं तुमसे?
आई थी मैं तुम्हारे पास,
छोड़ कर सब कुछ अपना,
घर और परिवार।
क्यों नहीं बन पाए
कभी तुम
पिता, भाई और
मित्र मेरे?
October 22, 2009 at 5:42pm
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