Friday, July 23, 2010

सपनों की

सपनों की...
हरियाली बन...
खेतों में ..
लहराऊँ....
पवन के झोंकों संग....
उस छोर पहुँच जाऊँ.....
बरसूँ...
निर्जन वन में....
पंछी गाएँ।....
ठंडी धूप में......
देखूँ उनको.......
पंख फैलाये....
लौटूँ....
फिर अपने
घर-आंगन । ..


March 4 at 4:06pm

प्रेम डगरिया ही ऐसी है
जहां न लुटने का ग़म होता :) :)

चंद लम्हों को ही बनती हैं
मुसव्विर आँखें..
ज़िन्दगी रोज़ तो
तस्वीर बनाने से रही

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